लालू यादव बने कॉमेडियनों के निशाने पर, मजाक उड़ा लेकिन न हुआ हमला, न केस… क्या थी सियासत?

स्टैंड अप कॉमेडियन कुणाल कामरा और महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे विवाद ने तमाम नेताओं पर होने वाली कॉमेडी की याद ताजा कर दी. इस फेहरिस्त में लालू प्रसाद यादव के लोकप्रिय सेंस ऑफ ह्यूमर और उनके ऊपर होने वाली कॉमेडी सबसे अनोखी और यादगार है. हालांकि एकनाथ शिंदे बहुत ही गंभीर नेता हैं, हर बयान सोच समझकर देते हैं. पब्लिक में उनकी छवि एक साफ सुथरी शख्सियत की है. जबकि आज से पच्चीस-तीस साल पहले के दौर में लालू प्रसाद यादव अपने भाषण और मनोरंजक अंदाज के लिए मशहूर थे. चारा घोटाला को लेकर बदनाम भी. मीडिया में उनके बयानों की सुर्खियां रहती थीं. बिहार ही नहीं बल्कि पूरे देश भर में लोकप्रिय रहे हैं. बिहार विधानसभा हो या संसद, लालू के भाषण गॉसिप का हिस्सा होते थे. आज एकनाथ शिंदे को केंद्र में रखकर कुणाल कामरा ने जिस अंदाज में सटायर किये हैं, एक दौर में लालू प्रसाद यादव पर ऐसे कटाक्षों की बौछार हुई थी.

लालू प्रसाद यादव ना केवल बिहार के मुख्यमंत्री रहे हैं बल्कि केंद्रीय रेल मंत्री के रूप में भी उन्होंने बड़ी ख्याति हासिल की थी. उनके बारे में एक ख्यात तथ्य है कि उन्होंने अपने कार्यकाल में भारतीय रेलवे को लाभ पहुंचाया था. यही वजह है कि रेलवे प्रबंधन में कुशलता और सफलता की उनकी उपलब्धि के मद्देनजर देश-विदेश के बड़े से बड़े मैनेजमेंट प्रशिक्षण संस्थानों में व्याख्यान के लिए आमंत्रित किया गया था. लालू यादव ने वहां शिरकत भी की. बिहार के मुख्यमंत्री के तौर पर लालू ने गैर कांग्रेसी सरकार की सत्ता चलाने में कीर्तिमान कायम किये थे. लालू जन-जन में लोकप्रिय थे. मीडिया और मनोरंजन जगत में उनकी खूब मिमिक्री की जाती थी. लेकिन कभी किसी पर गुस्सा नहीं किया.

हर वर्ग में लोकप्रिय रही लालू की शैली
लालू प्रसाद यादव ने सन् 1990 में बिहार के मुख्यमंत्री के तौर पर राज पाट संभाला था. उस वक्त तक उनके सेंस ऑफ ह्यूमर से बहुत कम लोग ही वाकिफ थे लेकिन धीरे- धीरे जैसे-जैसे लालू ने पूरे बिहार में भ्रमण करना शुरू किया, गांव-गांव के पिछड़े, दलित समाज के लोगों के बीच अपनी पैठ बनाते चले गए. लालू की शख्सियत की सबसे बड़ी खूबी रही कि गांववालों के बीच उन्हीं की भाषा और मुहावरे में बातचीत करते, उनके जमीनी मुद्दे उठाते और बीच-बीच में ऐसा हास्य पैदा करते कि उनका संदेश उस तबके तक भी पहुंच जाता था, जो उनकी सभा से दूरी बनाकर रखते थे या कि उनके विरोधी थे. बाद के दौर में जब संयुक्त मोर्चा बना तो वीपी सिंह, चंद्रशेखर जैसे नेताओं के बीच भी उनकी छवि एकदम अलग रही.

शेखर सुमन से राजू श्रीवास्तव तक किये व्यंग्य
देखते ही देखते लालू प्रसाद यादव के भाषण की शैली इंटरनेट के शुरुआती दौर में भी आज की तरह वायरल हो चुकी थी. वहअपने भाषणों में उन मुद्दों को उठाते जिस पर अब तक कोई भी नेता बात नहीं करते थे. तब अखबारों में लालू के कार्टून, पत्रिकाओं के पन्ने पर लालू पर व्यंग्य, टीवी पर लालू के भाषणों की एडिटेड क्लिप्स की शुमार थी. जैसे ही संचार क्रांति के दौर में मनोरंजन चैनलों की कतारें लगीं, लालू पर स्टैंडअप कॉमेडी की भी बौछार शुरू हो गई. जाने माने कलाकार शेखर सुमन से लेकर राजू श्रीवास्तव तक ने लालू प्रसाद यादव पर खूब कटाक्ष किये. हास्य कलाकारों के लिए लालू सबसे प्रिय विषय बन गये.

जब लालू लुक में नजर आए परेश रावल
लालू प्रसाद यादव साल 1997 तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे. बाद में लालू 2004 से 2009 तक तब केंद्र में सत्तारूढ़ यूपीए सरकार में रेल मंत्री भी रहे. संसद में उन्होंने अपनी स्टाइल की अंग्रेजी और गंवई चुटकुलों से भरे भाषणों से तमाम सांसदों को खूब हंसाया है. और यही अंदाज कॉमेडियनों के लिए सबसे खास विषय बन गया. मुझे याद आ रहा है इसी दौर में सन् 1998 में एक फिल्म आई थी- दंडनायक. नसीरुद्दीन शाह अभिनीत यह फिल्म वैसे तो औसत दर्जे की रही है लेकिन परेश रावल के गेटअप और लुक को लेकर चर्चा में आ गई थी. इसमें परेश रावल लालू जैसे ही दिखाई देते हैं. तब पूरे बिहार में परेश रावल का वह लुक चर्चा का विषय था.

शायद परेश रावल और लालू प्रसाद यादव के बीच पॉलीटिकल केमेस्ट्री तभी से बन गई. इसके बाद परेश रावल जब राजनीति में आए तब कई मौकों पर दोनों के बीच ट्विटर पर वार-पलटवार हुए. राजनीतिक छींटाकशी जमकर हुई.

लालू का सबसे अधिक उड़ा मजाक
लालू प्रसाद यादव के जितने मजाक उड़ाये गये, उन पर जितनी कॉमेडी की गई, भारतीय राजनीति में कभी किसी नेता पर नहीं की गई. उस दौर में आज की तरह यूट्यूब पर स्टैंड कॉमेडी का चलन नहीं था लेकिन टीवी पर शेखर सुमन और बाद के दौर में राजू श्रीवास्तव ने लालू पर खूब कॉमेडी की थी. लालू पर साधना कट बाले बोलकर भी तंज कसा जाता था. लेकिन सबसे अनोखी बात ये कि इतने मजाक उड़ाने के बावजूद लालू प्रसाद यादव के समर्थकों ने कभी किसी कलाकार पर हमले नहीं किये ना ही उनके घर या दफ्तर में तोड़ फोड़ की. लालू के कार्यकाल में कलाकारों पर हमले की ऐसी किसी घटना का नजीर नहीं है.

लालू खुद ही कॉमेडी के बादशाह
वास्तव में लालू अपने ऊपर किये गये कटाक्षों की बहुत कम ही परवाह करते थे. कई बार तो खुद से देख भी नहीं पाते थे किसने क्या कहा या लिखा या फिर देखते भी थे तो नजरअंदाज कर देते थे. इसकी दो बड़ी वजहें थीं. पहली वजह ये थी कि लालू पर हास्य-व्यंग्य में टीका-टिप्पणी करने वाले कलाकारों से उनके संबंध सामान्य थे. वे कलाकार लालू के सियासी तौर विरोधी नहीं थे और ना ही किसी और राजनीतिक दलों को लाभ पहुंचाने के लिए सटायर करते थे. दूसरी सबसे बड़ी वजह मुझे यह लगती है कि लालू खुद को ही सबसे बड़ा हास्य कलाकार मानते थे. वे खुद ही कॉमेडी के बादशाह थे, अपने आगे किसी भी कॉमेडियन को दूसरे दर्जा का ही मानते थे.

 

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